साक्षी भाव से सब ठीक हो सकता है — पर कैसे?

झील के किनारे ध्यान मुद्रा में बैठा व्यक्ति, जो साक्षी भाव में स्वयं को शांत भाव से देख रहा है

बहुत लोग यह सुनकर सुकून महसूस करते हैं कि साक्षी भाव से सब ठीक हो सकता है। यह वाक्य एक उम्मीद देता है — कि जो भीतर उलझा है, जो टूटा हुआ लगता है, जो बार-बार वही गलतियाँ दोहरा रहा है, वह किसी न किसी तरह संभल सकता है। लेकिन यहाँ एक बुनियादी फर्क समझना ज़रूरी है। साक्षी भाव से चीज़ें इसलिए ठीक नहीं होतीं क्योंकि आप कुछ कर रहे होते हैं, बल्कि इसलिए ठीक होती हैं क्योंकि आप पहली बार कुछ नहीं कर रहे होते। और इंसान के लिए “न करना” सबसे मुश्किल काम है।

साक्षी भाव का मतलब यह नहीं है कि आप दुख को देखकर उससे ऊपर उठ जाएँगे। इसका मतलब यह भी नहीं है कि आप दर्द से दूर हो जाएँगे। साक्षी भाव का असली अर्थ है — दुख के साथ बिना भागे बैठ जाना, बिना उसे सही ठहराए, बिना उसे गलत साबित किए। यही वह जगह है जहाँ चीज़ें बदलती हैं। नहीं इसलिए कि दुख चला गया, बल्कि इसलिए कि दुख को ढोने वाला “मैं” धीरे-धीरे ढीला पड़ने लगता है।

असल समस्या दुख नहीं है। समस्या यह है कि हम हर अनुभव के साथ अपनी पहचान जोड़ लेते हैं। दुख आया तो हम “दुखी इंसान” बन जाते हैं। डर उठा तो हम “डरे हुए व्यक्ति” हो जाते हैं। असफलता हुई तो हम खुद को “नाकाम” मान लेते हैं। साक्षी भाव यहीं काम करता है। यह पहचान को अनुभव से अलग करता है। जब आप दुख को देखते हैं, लेकिन उसे मैं नहीं कहते, तभी भीतर पहली दरार पड़ती है। यही दरार आगे चलकर रास्ता बनती है।

लोग अक्सर पूछते हैं — अगर बस देखने से ही सब ठीक हो सकता है, तो फिर प्रयास, मेहनत, बदलाव की ज़रूरत ही क्या है? यह सवाल सही है, लेकिन अधूरा है। क्योंकि ज़्यादातर प्रयास भ्रम से पैदा होते हैं। हम कुछ बदलना इसलिए चाहते हैं क्योंकि हमें लगता है कि जैसे हम अभी हैं, वह ठीक नहीं है। यह धारणा ही सारी बेचैनी की जड़ है। साक्षी भाव इस धारणा को सीधा चुनौती देता है। यह कहता है — पहले देखो कि असल में हो क्या रहा है, बिना यह तय किए कि वह ठीक है या गलत।

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जब आप साक्षी भाव में बैठते हैं, तो शुरुआत में कुछ भी ठीक होता हुआ महसूस नहीं होता। उल्टा, चीज़ें और बिगड़ी हुई लगती हैं। क्योंकि अब आप उन्हें ढक नहीं रहे होते। अब distractions नहीं होते। अब मोबाइल, बातचीत, सलाह, प्रेरणा — कुछ भी बीच में नहीं आता। केवल आप और आपका मन। यही वजह है कि ज़्यादातर लोग साक्षी भाव को कुछ दिनों में छोड़ देते हैं। वे कहते हैं, “मेरे लिए काम नहीं कर रहा।” दरअसल, वह काम करना शुरू ही तब करता है जब आप असहज होते हैं।

साक्षी भाव से सब ठीक इसलिए होता है क्योंकि धीरे-धीरे मन की आदतें उजागर होने लगती हैं। आप देख पाते हैं कि कौन-सा डर बार-बार लौटता है। कौन-सा विचार हर फैसले को प्रभावित करता है। कौन-सी याद आज भी आपके वर्तमान को खींच रही है। जब तक आप इन चीज़ों को सिर्फ़ देखते नहीं हैं, तब तक आप उनसे मुक्त नहीं हो सकते। लड़ने से, बदलने से, दबाने से वे और गहरी हो जाती हैं। देखने से वे कमजोर पड़ती हैं।

यहाँ एक बहुत महत्वपूर्ण बात समझनी होगी। साक्षी भाव कोई तकनीक नहीं है जिसे सही तरह से करने पर परिणाम मिल जाए। यह कोई योगासन नहीं है, न ही ध्यान की कोई विधि। यह एक स्थितिगत बदलाव है — आप जीवन के बीच में खड़े होकर उसे पकड़ने की कोशिश छोड़ देते हैं। और यही छोड़ना, धीरे-धीरे चीज़ों को अपनी जगह पर लौटने देता है।

बहुत बार लोग यह उम्मीद लेकर बैठते हैं कि साक्षी भाव से उनका मन शांत हो जाएगा। लेकिन सच्चाई यह है कि मन शांत नहीं होता, मन स्पष्ट होता है। और स्पष्टता शांति से ज़्यादा शक्तिशाली चीज़ है। शांति अक्सर सुस्ती बन जाती है, लेकिन स्पष्टता आपको भ्रम से बाहर निकालती है। जब मन स्पष्ट होता है, तब फैसले अपने-आप बदलते हैं। रिश्तों में प्रतिक्रिया कम होती है। डर होते हुए भी आप उससे संचालित नहीं होते। यही वह जगह है जहाँ बाहर से देखने वाले को लगता है कि “अब सब ठीक हो गया है।”

साक्षी भाव से सब ठीक इसलिए भी होता है क्योंकि आप खुद को सुधारने की परियोजना बनाना बंद कर देते हैं। आजकल इंसान खुद को एक problem की तरह देखता है — जिसे fix करना है। कोई कहता है confidence बढ़ाओ, कोई कहता है trauma heal करो, कोई कहता है mindset बदलो। इन सबके बीच इंसान खुद से और दूर होता चला जाता है। साक्षी भाव इस पूरी दौड़ को रोक देता है। वह कहता है — अभी जो है, उसे पूरा देखो। सुधार अपने-आप सही दिशा में होगा, जब ज़रूरत होगी।

एक और कड़वी सच्चाई है। साक्षी भाव से सब ठीक इसलिए होता है क्योंकि आप यह स्वीकार कर लेते हैं कि कुछ चीज़ें शायद कभी पूरी तरह ठीक नहीं होंगी। यह सुनने में उल्टा लगता है, लेकिन यही मुक्त करता है। जब आप किसी डर, किसी कमी, किसी अधूरेपन को हटाने की ज़िद छोड़ देते हैं, तब वह आपको नियंत्रित करना बंद कर देता है। आप उसके साथ जीना सीख लेते हैं, और यही जीना धीरे-धीरे उसे महत्वहीन बना देता है।

जो लोग साक्षी भाव को सही से जीते हैं, वे अलग इसलिए नहीं दिखते क्योंकि उनके जीवन में समस्या नहीं होती। वे अलग इसलिए दिखते हैं क्योंकि समस्या उन्हें परिभाषित नहीं करती। वे रोते हैं, डरते हैं, उलझते हैं — लेकिन भीतर कहीं एक जगह होती है जो सब देख रही होती है। वही जगह स्थिर रहती है। वही जगह “ठीक” है। और जब भीतर एक जगह ठीक हो जाती है, तो बाहर की बहुत-सी चीज़ें अपने-आप संतुलन में आने लगती हैं।

अंत में, अगर सीधे जवाब दूँ — हाँ, साक्षी भाव से सब ठीक हो सकता है।
लेकिन “सब ठीक” का मतलब यह नहीं है कि जीवन वैसा हो जाएगा जैसा आप चाहते थे।
“सब ठीक” का मतलब यह है कि जीवन जैसा है, उससे आपकी लड़ाई खत्म हो जाती है।

और सच कहूँ तो, इंसान को सबसे ज़्यादा राहत वहीं से मिलती है।

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