अहंकार से मुक्ति: सच्चे जागरण की ओर साधना का मार्ग
कबीर ने कहा था — “प्रेम गली अति साँकरी, ता में दो न समाय संग।” यह एक साधारण पंक्ति नहीं बल्कि आत्मा पर चोट है। इसका अर्थ है कि जब तक “मैं” मौजूद है, तब तक प्रेम, सत्य या ईश्वर उस व्यक्ति तक नहीं पहुँच सकता। अहंकार वही दीवार है जो हमें बाकी सब से अलग करती है, और यही दीवार हमारे सभी दुखों की जड़ है। इंसान अपने जीवन का अधिकांश हिस्सा इस “मैं” को सजाने-सँवारने में बिता देता है, पर कभी यह नहीं देखता कि यह “मैं” असल में है क्या। अहंकार बहुत चालाक होता है — वह कभी धन के रूप में आता है, कभी धर्म के रूप में, और कभी आध्यात्मिकता के वेश में। कबीर ने चेताया था कि जो अपने को ज्ञानी समझे, वही सबसे अज्ञानी है, क्योंकि अहंकार मरना नहीं जानता, वह बस रूप बदलता रहता है। ओशो कहते हैं कि अहंकार एक बहुत परिष्कृत बीमारी है, जैसे-जैसे तुम आध्यात्मिक बनते हो, वह और अधिक सूक्ष्म हो जाता है। वह यहां तक कहने लगता है, “मैं अब अहंकार रहित हूँ।” और यही सबसे गहरा भ्रम है, क्योंकि जिस क्षण तुम कहते हो “मैं अहंकार रहित हूँ,” उसी क्षण अहंकार ने नया रूप ले लिया होता है।
रमण महर्षि के पास एक व्यक्ति गया और बोला, “मुझे बताइए, मैं कौन हूँ?” महर्षि मुस्कुरा दिए और बोले, “अगर तू सच में जान गया कि तू कौन है, तो तू समाप्त हो जाएगा।” ये शब्द किसी को संतुष्ट करने के लिए नहीं थे, बल्कि हिलाने के लिए थे। क्योंकि जागरण ज्ञान से नहीं आता, वह अवलोकन से आता है। तुम जितना “मैं” से लड़ते हो, वह उतना ही मजबूत होता जाता है। लेकिन जब तुम बस उसे देखने लगते हो — बिना किसी निर्णय या बदलाव की कोशिश के — तब वह धीरे-धीरे गलने लगता है। यही सच्ची साधना है। जागरण कोई उपलब्धि नहीं, बल्कि हर दिन का गलना है — जब कोई तुम्हारा अपमान करे और तुम प्रतिक्रिया न दो, तो अहंकार का एक हिस्सा गिर जाता है; जब कोई तुम्हारी प्रशंसा करे और तुम भीतर से मौन रहो, एक और परत मिट जाती है। और जब तुम्हें यह दिखने लगे कि जीवन अपने आप घट रहा है, कोई “मैं” कुछ कर नहीं रहा, तब भीतर एक निःशब्दता उतर आती है। यही निःशब्दता जागरण की शुरुआत है।
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अहंकार को छोड़ना आसान नहीं, यह सबसे सच्ची तपस्या है। जब “मैं” टूटता है, तो इंसान को लगता है कि सब कुछ खत्म हो गया — रिश्ते, पहचान, उद्देश्य, सब कुछ। लेकिन असल में सिर्फ झूठ टूट रहा होता है। हम इतने वर्षों से अपने झूठ के साथ जीते हैं कि जब वह गिरता है, तो हमें लगता है कि जीवन ही बिखर गया है। ओशो ने कहा था, “अहंकार की मृत्यु तुम्हारी मृत्यु नहीं, बल्कि तुम्हारे वास्तविक जन्म की शुरुआत है।” जब तुम्हारा झूठ मर जाता है, तब तुम खाली हो जाते हो। लेकिन यह खालीपन डरावना नहीं, बल्कि वही स्थान है जहाँ से सत्य बोलता है। हर संत, हर गुरु इसी की ओर इशारा करता है — “खुद को छोड़ दो।” कोई भी गुरु, कोई भी भगवान तुम्हें तब तक नहीं छू सकता जब तक तुम्हारे भीतर यह “मैं” बना हुआ है।
आज की दुनिया में अहंकार पहले से कहीं ज्यादा सक्रिय है। पहले यह सिर्फ मन में था, अब यह हर स्क्रीन पर है। सोशल मीडिया ने अहंकार को और शोरगुल भरा बना दिया है। हर पोस्ट एक घोषणा है — “देखो, मैं भी मौजूद हूँ।” हर लाइक, हर व्यू एक छोटा नशा है जो यह भ्रम पैदा करता है कि “मैं कुछ हूँ।” लेकिन क्या तुमने गौर किया है कि जब तुम्हारे पास सब कुछ होता है — शोहरत, पैसा, पहचान — तब भी भीतर एक खालीपन बना रहता है? वही खालीपन तुम्हारी आत्मा की आवाज़ है, जो कहती है, “जितना तू बाहर ढूँढेगा, उतना तू मुझसे दूर जाएगा।” कबीर ने इसी सच्चाई को बहुत सादे शब्दों में कहा — “जो तू खोजन को गया, सो मैं न मिल्यो कोई; जो तू खोजन आपनै, तो मुझसे मिल्यो तुरत ही।” जो बाहर सत्य को ढूँढता है, उसे कभी नहीं मिलता; जो भीतर झाँकता है, वह पाता है कि सत्य तो हमेशा से यहीं था — बस बीच में “मैं” खड़ा था।
सच तो यह है कि “मैं” कोई वस्तु नहीं, बल्कि एक कहानी है — एक मानसिक कल्पना। तुम्हारा नाम, तुम्हारा पेशा, तुम्हारा इतिहास — ये सब कहानियाँ हैं जो तुम्हें यह अहसास दिलाती हैं कि तुम कोई हो। लेकिन जागरण तब होता है जब यह भ्रम टूटता है कि “मैं” कोई स्थायी सत्ता हूँ। तब तुम यह देख पाते हो कि “मैं” सिर्फ कहानी का पात्र नहीं, बल्कि वह चेतना हूँ जो कहानी को देख रही है। रमण महर्षि कहते हैं, “अहंकार ‘मैं’ का विचार है; जब वह मर जाता है, तो केवल शुद्ध चेतना बचती है।” उस शुद्ध चेतना में कोई “करने वाला” नहीं होता — बस घटित होना होता है। सूरज उगता है, हवा चलती है, सांस चलती है, और तुम बस साक्षी होते हो। वही साक्षीभाव जागरण है।
कबीर ने कहा, “बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिल्या कोई; जो मन खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोई।” जब यह समझ आ जाती है कि दुख का कारण कोई और नहीं, बल्कि हमारा अपना “मैं” है, तब भीतर से तुलना, शिकायत और अपेक्षाएँ सब खत्म हो जाती हैं। एक गहरी शांति उतरती है, जो किसी कारण से नहीं होती। वही शांति जागरण है, वही मोक्ष है। जागरण का अर्थ यह नहीं कि तुम हमेशा खुश रहो; इसका अर्थ यह है कि तुम्हें अब “खुश रहने” की ज़रूरत ही नहीं बचती। तुम बस हो — और वही होना ही ईश्वर का अनुभव है।
अहंकार वह मुखौटा है जिसे हमने बचपन से पहना हुआ है। जागरण वह क्षण है जब तुम पहली बार बिना किसी मुखौटे के खड़े होते हो — नंगे, सच्चे, और निर्वस्त्र आत्मा के रूप में। वह क्षण सबसे अधिक दर्दनाक भी होता है और सबसे अधिक पवित्र भी। उसी क्षण तुम गिरते भी हो और जन्म भी लेते हो। जब “मैं” गिरता है, तब पहली बार “मैं” प्रकट होता है — वह नहीं जो नाम, रूप या विचारों में बंद है, बल्कि वह जो सदा से मौन था। और वहीं से वास्तविक जीवन शुरू होता है।
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