भविष्य का डर कैसे कम करें? | भय, अनिश्चितता और मन की सच्चाई
भविष्य का डर इसलिए पैदा नहीं होता कि आगे क्या होने वाला है, बल्कि इसलिए होता है क्योंकि आज हम अपने ही साथ खड़े नहीं हो पाते। जब इंसान अपनी वर्तमान स्थिति से ही भाग रहा होता है, तब भविष्य उसे अंधकार जैसा लगने लगता है। यदि आज का दिन ही भारी महसूस हो रहा हो, तो कल का विचार अपने-आप दबाव बन जाता है। इसीलिए भविष्य का डर वास्तव में भविष्य की समस्या नहीं है, यह वर्तमान के साथ हमारे संबंध की समस्या है।
अधिकतर लोग जब कहते हैं कि उन्हें भविष्य का डर लग रहा है, तो उनके मन में कोई एक निश्चित घटना नहीं होती। डर इस बात का होता है कि यदि परिस्थितियाँ बिगड़ गईं तो क्या मैं खुद को संभाल पाऊँगा। यदि स्वास्थ्य फिर से गिर गया, यदि पैसा कम पड़ गया, यदि रिश्तों में कोई साथ देने वाला न रहा, यदि मैं असफल हो गया — तो क्या मैं अकेले यह सब सह पाऊँगा। यानी डर भविष्य का नहीं, अपने ही सामर्थ्य पर भरोसे के टूटने का होता है। इंसान को अपने आप पर संदेह होने लगता है, और वही संदेह भविष्य का रूप ले लेता है।
इस डर से निपटने के लिए लोग अक्सर गलत रास्ता चुन लेते हैं। कोई कहता है सकारात्मक सोचो, कोई योजना बनाने की सलाह देता है, कोई लक्ष्य तय करने को कहता है। सुनने में ये बातें ठीक लगती हैं, लेकिन जब मन पहले से ही थका हुआ हो, तो यही बातें और अधिक बोझ बन जाती हैं। योजना दबाव बन जाती है, लक्ष्य अपराधबोध पैदा करते हैं, और “वर्तमान में जियो” भी एक और अपेक्षा बन जाता है। भविष्य का डर सोचने की समस्या नहीं होता, यह सहन-क्षमता की समस्या होता है।
सहन-क्षमता का अर्थ आत्मविश्वास या प्रेरणा नहीं होता। इसका अर्थ होता है — जो कुछ आप भीतर महसूस कर रहे हैं, क्या आप उसके साथ बिना भागे रह पा रहे हैं। जब इंसान अपनी बेचैनी, उलझन और अनिश्चितता को तुरंत ठीक करने की कोशिश करता रहता है, तब उसके भीतर लगातार एक युद्ध चलता रहता है। और जब आज ही इतनी लड़ाई चल रही हो, तो आने वाला कल अपने-आप डरावना लगने लगता है। भविष्य का डर तब बढ़ता है जब वर्तमान का बोझ बिना सुने ढोया जा रहा होता है।
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सच यह है कि भविष्य का डर भविष्य को नियंत्रित करने से कम नहीं होता। भविष्य का डर अपने ही साथ रहना सीखने से कम होता है। इसका अर्थ यह नहीं कि सब कुछ छोड़ दिया जाए या कुछ किया ही न जाए। इसका अर्थ केवल इतना है कि अपनी स्थिति के साथ झूठ बोलना बंद कर दिया जाए। जब आप स्वयं से यह स्वीकार कर लेते हैं कि “हाँ, मैं डरा हुआ हूँ”, “हाँ, मुझे स्पष्टता नहीं है”, “हाँ, मुझे नहीं पता आगे क्या होगा”, तब पहली बार मन को लड़ना नहीं पड़ता। और जहाँ लड़ाई समाप्त होती है, वहीं थोड़ी-सी जगह बनती है।
भविष्य का डर इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि हम हर समय अपने आप की तुलना किसी आदर्श रूप से करते रहते हैं। सामाजिक माध्यमों पर लोग स्थिर, सधे हुए और आत्मविश्वासी दिखाई देते हैं। हम अपनी भीतर की उलझन की तुलना उनके बाहर के चेहरे से कर लेते हैं। यह तुलना मन को यह महसूस कराती है कि शायद हम ही पीछे रह गए हैं। जबकि सच यह है कि अधिकतर लोग बस चलते जा रहे होते हैं; किसी को भी निश्चित रूप से नहीं पता होता कि वह कहाँ पहुँच रहा है। फर्क बस इतना है कि लोग अपनी अनिश्चितता छिपा लेते हैं।
भविष्य का डर तब भी बढ़ता है जब हम हर प्रश्न का अंतिम उत्तर आज ही चाहते हैं। कौन-सी नौकरी सही होगी, कौन-सा निर्णय गलत साबित होगा, कौन-सा रास्ता सुरक्षित है। जबकि जीवन में स्पष्टता अक्सर पहले नहीं आती। स्पष्टता चलने के बाद आती है। जो लोग आज स्पष्टता की प्रतीक्षा में रुक जाते हैं, वे वास्तव में गति को रोक देते हैं। और जब गति रुक जाती है, तो मन अपने-आप सबसे बुरे अनुमान गढ़ने लगता है।
इस डर को कम करने का एक सीधा तरीका है — भविष्य के बारे में सोचना बंद करना नहीं, बल्कि भविष्य के नाम पर खुद को सताना बंद करना। आपका काम यह नहीं है कि आप पाँच साल बाद का पूरा नक्शा बना लें। आपका काम केवल इतना है कि आज जैसी स्थिति है, उसके साथ थोड़ा ईमानदार हो जाएँ। जब आप अपनी वर्तमान सच्चाई को बिना निर्णय के देख पाते हैं, तो भविष्य अपने-आप इतना भारी नहीं लगता।
भविष्य का डर कम होने का अर्थ यह नहीं कि डर पूरी तरह समाप्त हो जाता है। इसका अर्थ केवल यह होता है कि डर आपको नियंत्रित करना बंद कर देता है। वह मौजूद रहता है, लेकिन आप उसके नीचे दबते नहीं हैं। आप समझने लगते हैं कि डर कोई सज़ा नहीं, बल्कि एक संकेत है। यह संकेत है कि आपको अपने साथ थोड़ा कोमल होना है, थोड़ा ठहरना है, और हर प्रश्न का उत्तर आज ही खोजने की ज़िद छोड़नी है।
अंत में एक बात साफ़ समझ लें — भविष्य का डर कमज़ोर लोगों को नहीं होता। यह उन लोगों को होता है जो जीवन को गंभीरता से लेते हैं, जो गलत नहीं करना चाहते, जो टूटना नहीं चाहते। डर आपकी असफलता का प्रमाण नहीं है, यह आपकी ईमानदारी का प्रमाण है। फर्क केवल इतना है कि या तो आप इस डर से भागते रहेंगे, या इसे समझकर अपने साथ चलना सीखेंगे।
भविष्य तभी थोड़ा हल्का लगता है, जब आप आज के बोझ को बिना भागे उठाना सीख लेते हैं।

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