भविष्य का डर कैसे कम करें? | भय, अनिश्चितता और मन की सच्चाई
भविष्य का डर इसलिए पैदा नहीं होता कि आगे क्या होने वाला है, बल्कि इसलिए होता है क्योंकि आज हम अपने ही साथ खड़े नहीं हो पाते। जब इंसान अपनी वर्तमान स्थिति से ही भाग रहा होता है, तब भविष्य उसे अंधकार जैसा लगने लगता है। यदि आज का दिन ही भारी महसूस हो रहा हो, तो कल का विचार अपने-आप दबाव बन जाता है। इसीलिए भविष्य का डर वास्तव में भविष्य की समस्या नहीं है, यह वर्तमान के साथ हमारे संबंध की समस्या है। अधिकतर लोग जब कहते हैं कि उन्हें भविष्य का डर लग रहा है, तो उनके मन में कोई एक निश्चित घटना नहीं होती। डर इस बात का होता है कि यदि परिस्थितियाँ बिगड़ गईं तो क्या मैं खुद को संभाल पाऊँगा। यदि स्वास्थ्य फिर से गिर गया, यदि पैसा कम पड़ गया, यदि रिश्तों में कोई साथ देने वाला न रहा, यदि मैं असफल हो गया — तो क्या मैं अकेले यह सब सह पाऊँगा। यानी डर भविष्य का नहीं, अपने ही सामर्थ्य पर भरोसे के टूटने का होता है। इंसान को अपने आप पर संदेह होने लगता है, और वही संदेह भविष्य का रूप ले लेता है। इस डर से निपटने के लिए लोग अक्सर गलत रास्ता चुन लेते हैं। कोई कहता है सकारात्मक सोचो, कोई योजना बनाने की सलाह देता ...