ध्यान में मन क्यों भटकता है ?
ज़्यादातर लोग ध्यान इसलिए शुरू नहीं करते क्योंकि उन्हें आत्मज्ञान चाहिए, बल्कि इसलिए करते हैं क्योंकि उनका दिमाग़ शोर कर रहा होता है। बेचैनी है, डर है, उलझन है, और कहीं न कहीं जीवन हाथ से फिसलता हुआ लग रहा होता है। ऐसे में ध्यान एक उम्मीद बन जाता है—कि शायद बैठते ही शांति मिल जाएगी, विचार रुक जाएँगे, और भीतर कुछ ठीक हो जाएगा। यहीं पहली गलती होती है। ध्यान को समाधान समझ लिया जाता है, जबकि ध्यान समस्या को उजागर करने की प्रक्रिया है। जब कोई इंसान पहली बार ध्यान में बैठता है, तो वह चुप्पी नहीं पाता—उसे शोर मिलता है। विचार तेज़ हो जाते हैं, यादें उभरने लगती हैं, दबे हुए डर सामने आने लगते हैं। और यहीं ज़्यादातर लोग निष्कर्ष निकाल लेते हैं कि “ध्यान मेरे लिए काम नहीं करता।” सच्चाई यह है कि ध्यान ने पहली बार उन्हें वही दिखाया है, जिससे वे सालों से भाग रहे थे। ध्यान फेल नहीं हुआ, उनका भ्रम टूटा है। ध्यान काम नहीं करता क्योंकि लोग उससे कुछ पाना चाहते हैं। शांति, सुख, स्थिरता, आनंद—कुछ भी। लेकिन ध्यान पाने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि देखने की प्रक्रिया है। जब तक इंसान ध्यान को एक टूल की तरह इस...