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Showing posts from December, 2025

ध्यान में मन क्यों भटकता है ?

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ज़्यादातर लोग ध्यान इसलिए शुरू नहीं करते क्योंकि उन्हें आत्मज्ञान चाहिए, बल्कि इसलिए करते हैं क्योंकि उनका दिमाग़ शोर कर रहा होता है। बेचैनी है, डर है, उलझन है, और कहीं न कहीं जीवन हाथ से फिसलता हुआ लग रहा होता है। ऐसे में ध्यान एक उम्मीद बन जाता है—कि शायद बैठते ही शांति मिल जाएगी, विचार रुक जाएँगे, और भीतर कुछ ठीक हो जाएगा। यहीं पहली गलती होती है। ध्यान को समाधान समझ लिया जाता है, जबकि ध्यान समस्या को उजागर करने की प्रक्रिया है। जब कोई इंसान पहली बार ध्यान में बैठता है, तो वह चुप्पी नहीं पाता—उसे शोर मिलता है। विचार तेज़ हो जाते हैं, यादें उभरने लगती हैं, दबे हुए डर सामने आने लगते हैं। और यहीं ज़्यादातर लोग निष्कर्ष निकाल लेते हैं कि “ध्यान मेरे लिए काम नहीं करता।” सच्चाई यह है कि ध्यान ने पहली बार उन्हें वही दिखाया है, जिससे वे सालों से भाग रहे थे। ध्यान फेल नहीं हुआ, उनका भ्रम टूटा है। ध्यान काम नहीं करता क्योंकि लोग उससे कुछ पाना चाहते हैं। शांति, सुख, स्थिरता, आनंद—कुछ भी। लेकिन ध्यान पाने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि देखने की प्रक्रिया है। जब तक इंसान ध्यान को एक टूल की तरह इस...

आप दुखी इसलिए नहीं हो क्योंकि ज़िंदगी मुश्किल है, बल्कि इसलिए क्योंकि आप सोचना बंद नहीं कर पा रहे

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ज़्यादातर लोग मानते हैं कि उनका दुख बाहर की परिस्थितियों की वजह से है — पैसे की कमी, रिश्तों की उलझन, करियर का दबाव, या भविष्य का डर। लेकिन अगर ईमानदारी से देखा जाए, तो सच कुछ और ही निकलता है। एक ही परिस्थिति में कोई शांत रहता है और कोई अंदर से टूट जाता है। फर्क हालात का नहीं,  सोच की आदत का होता है । आप दुखी इसलिए नहीं हैं क्योंकि ज़िंदगी मुश्किल है, बल्कि इसलिए क्योंकि आपका दिमाग़ हर बात को पकड़कर छोड़ नहीं पाता। आज का इंसान शारीरिक मेहनत से नहीं, मानसिक थकान से टूट रहा है। दिमाग़ हर समय या तो बीते हुए कल में अटका रहता है या आने वाले कल की कल्पनाओं में उलझा रहता है। जो अभी चल रहा है, वही सबसे कम देखा जाता है। यही लगातार चलने वाली सोच धीरे-धीरे बोझ बन जाती है, और फिर वही बोझ दुख कहलाने लगता है। समस्या यह नहीं है कि हम सोचते हैं। समस्या यह है कि  हम सोच को नियंत्रित नहीं करते, सोच हमें नियंत्रित करने लगती है । एक छोटी-सी बात दिमाग़ में आती है, फिर वह कहानी बनती है, फिर डर, फिर कल्पना, फिर निष्कर्ष — और अंत में तनाव। यह सब इतनी तेज़ी से होता है कि हमें पता भी नहीं चलता कि हम कब...

डिप्रेशन से बाहर निकलने के 5 spiritual तरीके

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आज हर दूसरा इंसान उदासी से जूझ रहा है, लेकिन उसे “डिप्रेशन” कहने की हिम्मत बहुत कम लोग करते हैं। क्योंकि समाज ने हमें सिखाया है कि दुख कमज़ोरी है और मुस्कुराना ताक़त। पर सच्चाई यह है कि डिप्रेशन अक्सर ज़्यादा सोचने वालों, ज़्यादा महसूस करने वालों और ज़िम्मेदारी उठाने वालों को होता है। यह आलस नहीं, यह थकान है — अंदर की। आध्यात्मिकता यहाँ कोई पूजा-पाठ का दिखावा नहीं है, बल्कि अपने भीतर चल रही लड़ाई को देखने का साहस है। 1. अपने दुख को “गलत” मानना बंद करो डिप्रेशन तब गहरा होता है जब हम खुद से कहते हैं — “मुझे ऐसा महसूस नहीं करना चाहिए।” यहीं से समस्या शुरू होती है। आध्यात्मिक दृष्टि कहती है: जो है, उसे पहले स्वीकार करो। अगर मन भारी है, तो है। अगर खालीपन है, तो है। बिना लेबल लगाए, बिना खुद को दोष दिए। जो इंसान अपने दुख से लड़ता है, वह हारता है। जो उसे देख लेता है, वही धीरे-धीरे बाहर आता है। यह स्वीकार्यता कोई कमजोरी नहीं, बल्कि पहला वास्तविक कदम है। 2. विचारों से दूरी बनाना सीखो, उनसे लड़ना नहीं डिप्रेशन में दिमाग़ लगातार बोलता है — “तू बेकार है, कुछ ठीक नहीं होगा, सब खत्...

Spiritual Awakening: Healing or Pain ?

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Spiritual awakening एक ऐसा अनुभव है जिसे शब्दों में बाँधना उतना ही कठिन है जितना कि किसी गहरे घाव की जलन को सिर्फ देखकर समझ लेना। यह यात्रा बाहर शांति की तरह दिखाई देती है, लेकिन भीतर इसका पहला कदम हमेशा तूफान लेकर आता है। यह कोई अचानक से प्राप्त होने वाली दिव्यता नहीं, बल्कि धीरे-धीरे टूटती पहचान, बिखरते रिश्ते, और भीतर से उभरती बेचैनी का सम्मिलित रूप है। जागरण की शुरुआत अक्सर उस पल से होती है जब इंसान महसूस करता है कि उसकी ज़िंदगी जैसे एक पुराने ढाँचे में फँसी हुई है—जहाँ वह जी तो रहा है, पर भीतर का सत्य बार-बार उस ढाँचे को तोड़ने की कोशिश कर रहा है। यही वह क्षण होता है जब पुराने beliefs काँपने लगते हैं: जो चीज़ें सालों से सही लगती थीं, अचानक hollow महसूस होने लगती हैं; जिन लोगों से भावनात्मक जुड़ाव था, वही दूर लगने लगते हैं; और जिन लक्ष्यों के पीछे भागते हुए हम थक चुके थे, वे भी अचानक बेअसर लगने लगते हैं। Spiritual awakening का सबसे बड़ा झटका यही होता है—यह आपकी दुनिया को बाहर से नहीं, भीतर से पुनर्निर्मित करता है। Awakening की पीड़ा इसलिए तीखी होती है क्योंकि यह सबसे पहले ego को चो...